करणी माता मंदिर, देशनोक, बीकानेर (Famous Karni Mata temple in Deshnoke, Bikaner)

यहां चूहों को काबा कहा जाता है और करणी माता के साथ-साथ इन्हें भी प्रसाद चढ़ाया जाता है। यहां कुछ सफेद चूहे भी रहते हैं, जिनका दिखना शुभ माना जाता है।


करणी माता मंदिर, देशनोक, बीकानेर (Famous Karni Mata temple in Deshnoke, Bikaner)

बीकानेर में एक मंदिर ऐसा भी है, जहां चूहों की पूजा होती है। बीकानेर से करीब 30 किलोमीटर दूर देशनोक में स्थित करणी माता के मंदिर परिसर में कई हजार चूहे रहते हैं। इतने चूहे होने के बावजूद यहां आज तक कोई बीमारी नहीं फैली। यहां चूहों को काबा कहा जाता है और करणी माता के साथ-साथ इन्हें भी प्रसाद चढ़ाया जाता है। यहां कुछ सफेद चूहे भी रहते हैं, जिनका दिखना शुभ माना जाता है।

करणी माता मां दुर्गा का अवतार हैं। मान्यता के अनुसार करणी का जन्म 1387 में एक चारण परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम रिघुबाई था और उनकी शादी साठिका गांव के किपोजी चारण से हुई थी। शादी के कुछ समय बाद ही उनका मन सांसारिक जीवन से ऊब गया और उन्होंने किपोजी की शादी अपनी छोटी बहन गुलाब से करवाकर खुद को मां दुर्गा की भक्ति में लगा दिया। कालान्तर में वे करणी माता के नाम से पूजी जाने लगी। बताते है कि करणी 151 साल जिंदा रही और 23 मार्च 1538 को ज्योतिर्लीन हुईं।

मंदिर में रहने वाले ये चूहे करणी माता की संतान माने जाते हैं। प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार करणी माता का सौतेला पुत्र (उसकी बहन गुलाब और उसके पति का पुत्र) लक्ष्मण, कोलायत में स्थित कपिल सरोवर में पानी पीने की कोशिश में डूब कर मर गया। जब करणी माता को यह पता चला तो उन्होंने, मृत्यु के देवता यम की तपस्या की। यम ने करणी की कठोर तपस्या को देखकर उस पुत्र को चूहे के रूप में पुनर्जीवित कर दिया। ये उसी पु़त्र के वंशज है। एक कहानी यह भी प्रचलित है कि बीकानेर से 20 हजार सैनिकों की सेना देशनोक पर चढ़ाई करने आई थी और करणी माता ने अपने प्रताप से इन्हें चूहे बना दिए और अपनी सेवा में रख लिया।

देशनोक में करणी माता के दो मंदिर हैं। दोनों मंदिर भव्य हैं। देशनोक स्टेशन के नजदीक स्थित मंदिर का निर्माण बीकानेर के महाराजा गंगासिंह ने करवाया था। ज्यादा चूहे इस मंदिर में है। यहां पर एक म्यूजियम भी जहां करणी माता के जीवन और उनसे जुड़ी आलौकिक घटनाओं की जानकारी चित्रों के माध्यम दी गई है। मंदिर में खाना पकाने के लिए रखा गया बड़ा कड़ाव भी आकर्षण का केंद्र है। दूसरा मंदिर यहां से करीब दो किलोमीटर दूर है। यह भव्य मंदिर सफेद संगमरमर से बना है। यहां पर एक गुफा है जहां करणी माता पूजा किया करती थी।
मन्दिर में दर्शन का समय: सुबह 6 बजे से रात 9.00 बजे तक
यहां साल में तीन बार मेले लगते है। चैत्र और आसोज की पूर्णिमा को यहां मेला लगता है। लेकिन, सबसे बड़ा मेला भाद्रपद में लगता है और बीकानेर तथा आसपास के जिलों से बड़ी संख्या में लोग पैदल यहां पहुंचते है। मंदिर दिनभर खुला रहता है। यहां पर खेजड़ी के साथ हनुमानजी की प्रतिमा है जिसकी पूजा होती है।।

Karni Mata Temple on Google Map

कैसे पहुंचें (How To Reach)

सड़क: बीकानेर बस स्टेण्ड से 30 किलोमीटर.
देशनोक बस स्टेण्ड से 500 मीटर.
रेलवे स्टेशन: देशनोक स्टेशन से 500 मीटर.

यहां तक पहुंचने के लिए बीकानेर से बस और टैक्सी सेवा उपलब्ध है।
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1 comments :

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